दीदी, पिछले महीने आटा-चावल के दाम देखकर तो मन भारी हो गया। पहले पचास रुपये में आधा किलो आटा आ जाता था, अब नहीं आता। मैंने अपनी कढ़ाई वाले कवर के खाली कपड़ों को जोड़-तोड़ कर नई डिज़ाइन बनाई, ताकि एक ही थैले से दो कवर निकल सकें। थोड़ी कमाई भी बचती है, बेटी के कंप्यूटर क्लास के लिए। सरकारी राशन हम तक नहीं पहुँचता, पड़ोसन की कहानी सुनकर मन में आया—हालत सबकी एक जैसी है, अपनी जुगाड़ से ही काम चलता है।
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