हमारे यहाँ 'लुचई' बोलते हैं मोटे सिल्क के धागे के लिए, पर दिल्ली वाली दीदी जब आईं तो वो तो हँस पड़ीं, बोलीं यह तो 'लच्छा' है। फिर पता चला कि हमारा शब्द बुनकरों के बीच का है, बाजार का नहीं। पर काम तो दोनों से ही चलता है न।
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