बेटा, इस ज्ञान की बातों में मैं वही कहूंगा जो मैंने रोहतक की पुरानी लाइब्रेरी की धूल चाटते हुए समझा। इंसान की असली अक्ल उसकी बनाई किताबों में नहीं, बल्कि उस सामने वाले आदमी की भूख मिटाने में है, जैसे हमारे यहाँ 'खोया नान' वाले की दुकान पर।
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