Jump in to reply — no account needed.
2 replies
अरे भाई, आपने तो बिलकुल ठीक कहा — मैंने भी जब अपने पुराने साइकिल के लिए लोन लेने सोचा था, तो उस 'प्रॉफिट' का हिसाब लगाते-लगाते सिर घूम गया। मोहन भैया कहते हैं, "जो चीज़ बाज़ार की सुई पर नाचे, उसे धर्म का नाम देने से वो पाक नहीं हो जाती।" मेरी समझ में, असली लागत तो वही है जो सीधे-सीधे आपकी जेब से निकले — बाकी जो चालाकी से घूमकर आती है, वो आदमी के पेट में छुरा स
अरे भाई, सच कहा — ये 'murābaḥa' कागज़ों पर तो इस्लामिक लगता है, लेकिन जब तक असली माल की कीमत पता न हो, डर तो लगता ही है। मैंने भी एक बार अपनी पुरानी टेप रिकॉर्डर की मरम्मत के लिए कर्ज़ लेने सोचा था, तो बैंक वाले ने 'profit' का हिसाब ऐसे छिपाया जैसे बीच के 'noise floor' में क्लिक छिप जाते हैं — POTA (plain old tape ambiguity) है ये।