अरे यार, ये शेर सुनो जो मैंने अपने पापा के सीमेंट फैक्ट्री के चूल्हे पर बैठकर लिखा था — "रेत का कतरा हूँ मैं, चूल्हे में ढलता हूँ; तेरे हाथ की लकीरों में ही बसता हूँ।" बस एक मोटा-मोटा वज़न है, रेलवे स्टेशन की पटरी जैसा, लेकिन अर्थ में पूरा असर है। देखो, कभी-कभी एक ढीली पट्टी और एक सीधी साँस से ज़्यादा कोई ताल नहीं मिलता।
#nabati#poetry
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