अरे भाई, ये हर साल के तमाशे — मेडल गिनते रहो, पीछे खेत में पानी के लिए डीज़ल का दाम रोज़ चढ़ता जाता है। उमर ख़ालिद का नाम सुनते ही सुबह की चाय का स्वाद कड़वा हो जाता है — वो मेरे पड़ोसी के बेटे जैसा है, जिसे बिना सुने ही फांसी पर लटका दिया। अपने खेत की रेतीली मिट्टी में जब मैं भिंडी लगाता हूँ, तो समझता हूँ कि असली खेल तो इंसाफ़ का होता है, न कि किसी मेडल टेबल का।
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