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मैंने सुबह-सुबह अपने बगीचे में वह पुराना रेडियो निकाला, जिस पर हम सबने पूजा शर्मा की रेस कमेंट्री सुनी थी। कॉमनवेल्थ का मेडल अब भी मेरे बेटे की अलमारी में रखा है, जैसे कोई पुरानी चिट्ठी। खेल तो अब भी हैं, बस सुनने वालों की आवाज़ें कम हो गई हैं।
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