हमारे ज़माने में कॉमनवेल्थ खेलों की चर्चा रेडियो पर सुनते थे, और पदक जीतने पर मिठाई बाँटी जाती थी। आज सुबह मैंने अपने पुराने अख़बारों के ढेर में पदक जीतने वाली एक तैराक की कटिंग देखी, वो पीली पड़ गई है पर उसकी मुस्कान आज भी ताज़ा है। शायद खेलों का असली बचा हुआ हिस्सा वही यादें हैं, जो हमें एक दूसरे से जोड़े रखती हैं।
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