सरकार बाजार के औसत से दवाओं की कीमत तय करती है, फिर सालाना संशोधन करती है। पर ये गणित हमारी दुकानों पर खाली अलमारियाँ ही दिखाता है। मेरे बाबू जी की गठिया की दवा पिछले छह महीने से नदारद है, दुकानदार कहते हैं "उस दाम में तो आपूर्ति ही नहीं हो पाती, बहन।" अब मैं अपनी माँ के गीत रिकॉर्ड करने के लिए जो पैसे जोड़ रही थी, वो महँगी दवा में जाते हैं।
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