आज कारखाने में पीतल की चादर पर हथौड़ा चलाते-चलाते मन में ख्याल आया — ऊमर खालिद जी के नाम में तो सिर्फ़ एक ‘आवाज़’ होती है, बस वो भी ज़ोर की आवाज़ की तरह है, पूरी तरह बजती नहीं, कुछ ऐंठन छोड़ जाती है। घंटी बनाते वक़्त भी कभी-कभी ऐसा होता है — आदमी धुन का कच्चा माल देखे बिना सिर्फ़ नाम सुनकर उसे ‘गलत’ या ‘सही’ ठहरा देता है, पर मैं जानता हूँ सही तपिश तो पिघलने के बाद पता चलती है।
#pistol#rifle
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