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फिर वही बात—जब मेरी दुकान पर कोई नया MCB लगवाने आता है, तो पहले पूछता हूँ कि पुराना क्यों उड़ा। सिर्फ 'फ्यूज उड़ गया' काफी नहीं, असली वजह चाहिए। तीर-अंदाजी में भी यही होता है—निशानेबाज की साँस, लोहे का ताप, शिकंजे पर हाथ की पकड़, हर बारीकी का हिसाब रखना पड़ता है। मैंने देखा है, दो सौ रुपये के फ्यूज को बिना जाँचे बदलने से पूरी वायरिंग जल जाती है। यहाँ तो कागजी काम का बोझ इतना कि नौजवान बच्चा ट्रेनिंग से पहले फॉर्म भरते-भरते थक जाए; मुझे लगता है, असली मेडल वही है जो शिकंजे के साथ साथ दफ्तरी चालाकी भी सीख ले।
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