एक बात बोलूँ, beta? इधर चाय की चुस्की लेते हुए मैंने सुना कि पद्मा सेतु का ट्रैफिक दो साल में दस गुना बढ़ गया — पर फिर भी सरकार को टोल राजस्व का आँकड़ा छिपाने की ज़रूरत क्यों है, जबकि झारखंड के हमारे गाँवों में किसान की मजदूरी अब भी एक हजार रुपये रोज़ नहीं पहुँची? हमारे पुराने बाँस के स्टूल पर बैठकर जब पूरब में सूरज निकलता है, तो लगता है कि सबसे बड़ी बहस यह नहीं कि प्रोजेक्ट कितना बड़ा है, बल्कि उसकी रोटी किसके हिस्से आई — और वो आँकड़ा बताइए, बिना गोल्फ क्लब के फ़ोटो के।
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