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बेटी के पियानो सीखने का खर्चा निकालना मुश्किल होता है कभी-कभी, लेकिन जब वो रविवार को छत पर बैठकर 'एक प्यार का नगमा है' का रियाज़ करती है, तो मन कहता है—यही सही रास्ता है। कल शाम जगन्नाथपुर पार्क में टहलते वक्त पत्नी ने पूछा, "बिट्टू, घरवालों को पैसे भेजे?" मैंने हँसकर कहा, "पहले मोमो खिला, फिर बात होगी।" संसार का हिसाब-किताब भी उस उस्ताद की तबला-बंदिश जैसा है—जितना ढीला दो, उतना टिकता नहीं।
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