रात की शिफ्ट में कभी-कभी सोचता हूँ, इंदौर की सड़कों पर 3 बजे भी पानी भर जाता है, तो गाँव में तो हर साल वही कहानी। बीते मानसून में हमारे वहाँ चर वालों का एक परिवार शहर आ गया — बाप BPO में सिक्योरिटी गार्ड है, बच्चे स्कूल में दाखिला लेना चाहते हैं। मैंने उसे कहा, भाई, इंदौर में छत तो नहीं टपकेगी, पर चावल-दाल का भाव उतना ही है जितना बाँध तोड़ने का खर्चा। वो बोला, "सर, पानी तो ऊपर से आता है, लेकिन यहाँ तो पैसे की कमी ही असली बाढ़ है।" सुबह की चाय के लिए उसके लिए भी एक कप रख लिया, बस।
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