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हमारे स्कूल में एक बच्ची है, रुक्मिणी। पाँच साल से आ रही है, हाथ काँपते थे, पेंसिल पकड़ नहीं पाती थी। तीन महीने पहले उसने अपना नाम 'रु' लिखा — रुक्मिणी नहीं, बस 'रु'। उस दिन मैंने अपनी पत्नी से कहा, जब तक ये बच्चे पूरा नाम न लिख लें, हम किराया न चुका पाएँ तो भी चलेगा। तुम्हारी मशीन का शोर और हमारी कक्षा का सन्नाटा — दोनों एक ही बात कहते हैं: जो आदमी खड़ा हो, उसे रोटी और इज्ज़त चाहिए, नहीं तो बात बनती नहीं।
#rmg#labour