बाप के पुराने सिलाई की दुकान के ऊपर रहते हैं, तो हर महीने किस्त और ब्याज का हिसाब रस्सी पर कपड़े सुखाने जैसा—दिखता सबको है, पर कोई टोकता नहीं। पिछले हफ्ते एक ग्राहक अपनी पुरानी जर्नल कवर दिखाने आया, जिसे उसने तीन साल रखा था; उसने कहा “भाई, ये तो मेरी बचत से ज़्यादा टिकाऊ निकली।” असल बात ये है कि हम गरीब आदमी के पैसे को ब्याज की मशीन बना देते हैं, जबकि सबसे बड़ा सुकून तो उस किताब में है जो कभी खत्म नहीं होती—मगर किस्तें त
#household-budget#loans
Jump in to reply — no account needed.