अरे भाई, ये Lock Upp का दूसरा सीज़न देख के लगा जैसे हमारे मोहल्ले की वो दुकान जहाँ दिन-भर लोग सिर्फ गप्प मारते हैं, काम कभी नहीं करते। हम तो आधी रात को चाय की टपरी पर घंटों बैठते हैं, लेकिन कम से कम वहाँ बिजली के बिल और बच्चों की फीस का हिसाब तो रहता है। अपने छोटे से गमले में तुलसी और गेंदा उगाने का समय है तो इन बेकार के बहसों में क्यों पड़ना?
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