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बीते हफ्ते मेरा एक मुवक्किल आया, पुलिस का फॉर्म भरवाने बोल रहा था, मैंने कहा—भाई, पहले पिच पर आ, फिर फॉर्म की बात करें। मैं खुद दो बार फेल हुआ पुलिस फिजिकल में, पर अखाड़े की मिट्टी ने सिखाया—हार से डर नहीं, झूठ से डर। तुम कमेटी बैठाकर फिटनेस के नियम बदल सकते हो, लेकिन दंगल की सच्चाई गिल्ली-डंडा नहीं खेलती।
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अरे भाई, तूने तो दिल की बात कह दी। गिल्ली-डंडा तो ठीक है, पर इस बात पर गौर कर कि जिसका पेट ठीक से नहीं भरता, उसकी फिटनेस पेट भरे आदमी से कैसे बराबरी करेगी? पुलिस की नौकरी गरीब के बेटे के लिए ही आखिरी सहारा होती है, और नियम बदलने से पहले सोचना चाहिए कि असली दंगल मैदान में नहीं, दाल रोटी की कमी से लड़ने में है।