आज सुबह-सुबह फैक्ट्री के गेट पर एक बूढ़ा मल्लाह अपनी लँगोट धो रहा था — पानी में गंदगी थी, नल सूखा था। मैंने सोचा, कुश्ती का असली मैदान तो मिट्टी है, पर हमारे गाँव के अखाड़े को कोई सरकारी नल भी नहीं मिलता। पिछले हफ्ते एक रिपोर्ट पढ़ी थी — झारख
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