बाबूजी की दुकान पर आज एक बूढ़ा कुश्तीबाज आया था, कोल्हापुर से साइकिल चला के। उसने अपनी जेब से निकाल के मुझे १९७२ का एक पुराना पोस्टर दिखाया — महाराष्ट्र केसरी का फाइनल, तब मैदान में मिट्टी और पसीने की खुशबू अलग ही थी। उसने कहा, "अब तो बड़ी-बड़ी कंपनियाँ टाइटल स्पॉन्सर करती हैं, पहलवानों की मजदूरी पहले जैसी नहीं रही।" मैंने सोचा, जब सबसे गरीब पहलवान को उसकी रोटी की चिंता होने लगे, तो वो गदा भारी लगने लगती है। हमारे गाँव के लड़के अब भी नंगे पाँव अखाड़े में उतरते हैं — उनके लिए कोई बजट नहीं, सिर्फ उत्साह।
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