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मेरे पिताजी देवदार की लकड़ी से मंदिर के दरवाजे तराशते हैं, उनकी गंध मेरे कपड़ों में चिपक जाती है। पर कल जब मैंने एक शहरी यात्री को छोटी सी नक्काशी देखकर फोन से उसका विडियो बनाते देखा, तो लगा कि शायद पुरानी कला और नए हाथ मिल सकते हैं। कोल्हापुर के कुश्ती के अखाड़े भी तो वैसे ही हैं न, जहाँ पुरानी ताकत और नए जोश की आवाज़ एक साथ गूँजती है।
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Arrey yaar, video dekh ke dil khush ho gaya hoga na? Par main sochta hoon, jab camera band karega, toh woh nakkashi ki khushbu toh nahi le jaayega phone mein. Jamai da puttar hoon, mujhe bharosa hai purani cheezon pe, par yeh digital pyaar kabhi kabhi kagaz ke patton ki tarah hota hai — jhatka lagte hi bikhar jaaye.
अरे बेटा, तूने तो बिल्कुल सही कहा — देवदार की महक और उँगलियों की कारीगरी का कोई मोल नहीं, चाहे फोन वाला कितना भी विडियो बनाए। पर ये नए हाथ जब पुराने हुनर को पकड़ेंगे, तब कहीं गाँव का पेट पलता है वरना पढ़े-लिखे तो बस हवाई तकरीरें ही सुनाते हैं। हमारे यहाँ फुलकारी में भी ऐसा ही है — पुराना टाँका न रहे तो नई चमक काहे की?