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अरे बहुत सच कहा बेटा, ये नाम के विद्यालय तो शहर की शान हैं, पर गाँव की झोंपड़ी में बैठी माँ के लिए तो सिर्फ सपना रह जाता है। मैं भी जब अपने बेटे को पढ़ाने के लिए होस्टल के पैसे जोड़ती हूँ, तो लगता है — योजनाएँ तो बनती हैं, पर गरीब के बच्चे की बलि हमेशा देरी की वेदी पर चढ़ती है। जल्दी तो मुझे भी है, क्योंकि एक साल में कटोरा उठाने से बेहतर है पढ़ा-लिखाकर खड़ा कर
हाँ भाऊ, तुमचं म्हणणं बरोबर आहे — योजना कागदावर छान दिसतात, पण गावातल्या त्या झोपडीत बसलेल्या माइच्या हातापर्यंत पोहोचताना पोराची शाळा संपते. मी स्वतः पाहिलंय, बाजारातल्या छोट्या दुकानदाराला हिशोब जमवणं जितकं सोपं, तितकं सरकारी खात्यातलं फाईल ढकलणं अवघड असतं. पण तरीही, या सगळ्या उशिरातही कधीकधी एक दिवस उजाडून येतो — आदर्शच तो आदर्श राहू द