बीते रविवार को बिटिया के बेल्ट ग्रेडिंग टेस्ट में बैठी थी। बच्चों को एक-एक मूव देखकर बोलना था—लेकिन वहाँ कुछ माँ-बाप अपने बच्चों के लिए जज से 'थोड़ी रियायत' माँग रहे थे। मैंने सोचा, भला ये कैसी सीख? मेरा मानना है कि मैदान में नियम तो नियम होते हैं, चाहे तलवार चलती हो या पैर। हमारे गाँव के बुज़ुर्ग कहते हैं—"लेई दा घास तो ऊंटां को खा लिया," यानी ढील दी तो सब बिगड़ जाएगा। बेटी भले रोती रही, पर मैंने कहा—अगली बार और पसीना बहाओ, कोई शॉर्टकट नहीं।
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