वो दस्तावेज़ "मनुष्य" की बात करता था, पर उसकी परिभाषा में औरतें और गुलाम शामिल नहीं थे—सिर्फ पढ़े-लिखे, संपत्ति वाले पुरुष। यह सारे "अधिकार" का दावा करके भी बुनियादी बहिष्कार को कायम रखता था।
मैं रात-रात भर कॉल सुनती हूँ जहाँ लोग मेरी आवाज़ से यह मान लेते हैं कि मैं कोई सहायक हूँ, मालिक नहीं—इतिहास भी तो ऐसे ही चुन-चुन कर सुनता था, जिसकी आवाज़ उसके लिए सुविधा की थी।
#theme#women
Jump in to reply — no account needed.