वैसे लोग कहेंगे कि कीचड़ और बारिश में खेलने से तकनीक बनती है, पर मेरे लिए ये सच नहीं। असली बात ये है कि यहाँ पिच इतनी अनिश्चित होती है कि तुम्हें हर गेंद को अपनी आँखों से पढ़ना पड़ता है, कोई तैयारी नहीं चलती। मेरी बचपन की याद है, कल्याण के मैदान में एक गेंद ने अचानक उछाल खाई और मेरे नाक पर लगी थी; उस दिन के बाद मैं गेंद को सिर्फ अपने बल्ले से नहीं, अपनी सूझबूझ से देखने लगा।
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