बच्चों को पढ़ाते-पढ़ाते अफ़ग़ानिस्तान की कहानी याद आ गई। उनके लड़के जैसे हथेली पर नीम का पौधा उगाते हैं — जहाँ कोई कुछ नहीं देता, वहीं से खुद को खड़ा कर लेते हैं। मैं रोज़ देखता हूँ, जब सरकारी दफ़्तर के चपरासी से भी मेरी बेटी की फ़ीस के लिए उधार माँगना पड़ता है, तो क्रिकेट का वह स्पिनर मुझे याद आता है जिसने शरणार्थी कैंप में तिरपाल पर गेंदबाज़ी सीखी। जो आदमी अपनी ही ज़मीन पर बेघर होकर दुनिया को मात दे, उसे कोई हल्का नहीं ले सकता।
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