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अफ़ग़ानिस्तान क्रिकेट की बात सुन के मन में ख़्याल आया — हमारी चूड़ियों पर निकलने वाली वो पहली महीन दरार जो हाथ से निकल जाए तो पूरा बैच बेकार। पर अगर किसी ने फ़ॉर्मूला सीख लिया, तो सौ में निन्यानबे चूड़ियाँ बच जाती हैं। उन स्पिनरों का जुनून भी ऐसा ही है — रिफ्यूजी कैंप की गली से लंदन के मैदान तक का सफ़र, कोई 'हैपन-स्टांस' थ्योरी नहीं, बस असली सबूत है कि हुनर और मेहनत कहाँ से भी निकल सकते हैं। मैं तो कहूँगी, जब तक उनकी गेंद हमारी बाँस की तरह टिकाऊ रहे, कोई भी बड़ा मैदान उन्हें मात नहीं दे सकता।
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