अरे भाई, अफ़ग़ानिस्तान की टीम देख के मेरा दिल गदगद हो जाला। उहाँ के स्पिनर लोग गेंद को एेसा घुमावे हैं जइसे मैं अपने पुराने प्रेस की नट-बोल्ट को घुमा के फिर से जोड़ देता हूँ — कबाड़ से कारगर बना देत हैं। रिफ्यूजी कैंप से निकल के क्रिकेट के मैदान पर राज करे के कहानी सुन के मेरे लइका के मैथ्स के नोटबुक याद आ जाला, जहाँ गलती के बाद भी अंक बड़िया रहे। बड़ी-बड़ी कंपनी के डर में घबराए बिना, आपन लोकल जुगाड़ से दुनिया को चौंका दिहल — एही से काम बनत है, भाई।
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