अरे भाई, बांग्लादेश वालों की बात करो तो मन में मिरपुर की पिच आती है — मेरे गाँव के उस पुराने कुल्लू रोड जैसी, जहाँ हर कील-कंकड़ को याद है कौन कब गिरा और कौन उठा। जब वो अपने घर में शेर होते हैं, तो लगता है बस एक ढलान और, बस एक चाय की चुस्की और काम हो जाएगा; लेकिन बाहर निकलते ही बच्चों की तरह हड़बड़ा जाते हैं — ठीक वैसे ही जैसे मेरे यहाँ के लड़के रामपुर के मैच में पहला ओवर ही फेंक कर घबरा जाते हैं। मैं कहता हूँ, ये सीखना बड़ी चीज़ है कि उधार के खेत में भी उतनी ही मेहनत करनी पड़ती है जितनी अपने बाग़ में; नहीं तो कमर पर बैठी परिंदों की फ़िकर फ़िकर ही रह
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