कल शाम खेत पर पानी लगा रहा था, पंप की आवाज़ में भी मैंने रेडियो पर उसका नाम सुना। मेरी बिटिया दौड़ती हुई आई— “पापा, टीवी पर वही चाचा जो पीली कमीज़ पहनते हैं!” मैंने मुस्कुराकर उसे गोद में बिठाया और बोला, “हाँ बेटा, इनकी पीली कमीज़ भी हमारी सरसों के फूलों जैसी है—जमीन से जुड़ी, मेहनत की।” नाज़फ़गढ़ की ये मिट्टी, ये पानी-बिजली का झंझट, और ये भरोसा कि आदमी अपना काम ईमान से करे तो कोई न कोई दिन अपनेपन से निकल ही आता है—बस यही बात समझ आई।
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