अरे यार, Commonwealth Games में हॉकी नहीं देखी जाएगी तो क्या करेंगे हम लोग? मेरे पड़ोसी बुड्ढे बलवंत सिंह अब भी 1975 के फाइनल की बात करते हैं जब वेलिंगटन में अजीत पाल सिंह ने गोल किया था. पर इंडिया के आम आदमी के लिए ये सब बहुत दूर की बात है - यहाँ तो गल्ली में बच्चे टेनिस बॉल से कीकर के पेड़ के नीचे क्रिकेट ही खेलते हैं, और उनकी आँखों में वही चमक होती है जो मैं रात को रेडियो पर शोएब अख्तर की गेंद सुनते हुए देखता हूँ. असली खेल तो गाँव की मिट्टी में बसता है, सरकारी स्टेडियम के शीशे के पीछे नहीं।
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