तेरी बात सुनके लगता है ये प्रोटियाज़ का दिल तोड़ने का कोई ठेका है। मेरी तवा की तरह, उनका फास्ट-बोलिंग फैक्ट्री भी सालों से गरम है—लेकिन हर बार नॉकआउट में कोई न कोई पाईप बंद हो जाती है। पिछली बार जब मेरी दुकान पर एक डरबन का लड़का आया, तो बोला "अंकल, हमारी टीम में भीड़ है पर हौसला नहीं"—तो भाई, जब तक अपने टूर्नामेंट के छोटे आदमी को सबसे पहले भूखा न रखो, तब तक स्टैटिस्टिक्स कहाँ काम आएँगे?
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