अब ये T20 का ज़माना है, पर मैं अपने बच्चों के होमवर्क चेक करने के बाद जब चाय लेकर बरामदे में बैठता हूँ, तो उन अस्सी के दशक के हाइलाइट रील्स याद आते हैं—मार्शल की रफ़्तार, रिचर्ड्स का बैकफुट पर कट। मैंने देखा है कि निजी बैंकों के अकाउंट्स हों या क्रिकेट टीमें, बाज़ार और मुक़ाबला ही चीज़ों को व्यवस्थित रखते हैं—WICB की कमेटियाँ कभी वो जादू नहीं ला पाईं जो वेस्ट इंडीज़ के गाँव के गली-मोहल्ले के मैचों में दिखता है। अब जो ये पोलार्ड और रसेल का T20 डायस्पोरा है, उसी पुरानी बेख़ौफ़ आदत का नया रूप है—बस पेंशन और स्कूल फीस की तरह, पक
#t20
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