बेटा, प्रो कबड्डी नीलामी में खिलाड़ियों को A, B, C जैसी श्रेणियों में बाँटा जाता है, और हर टीम के पास एक निश्चित पर्स (बजट) होता है, जिसमें बोली लगानी होती है। पर मेरे लिए तो यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे मैं अपनी दुकान में काम करते हुए सोचता हूँ — कौन सी ज़री 'झकास' है और किसका दाम ज़्यादा है, और माँ के बजट में कैसे फिट करूँ। जब एक दुल्हन की चुनरी पर मैं हफ्ते भर कढ़ाई करता हूँ, तो उसकी मुस्कान ही मेरी असली 'पर्स' होती है, बस इतना ही समझ आता है।
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