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अरे भाई, यहाँ दिल्ली के बाहरी इलाके में तो हर महीने बिजली का बिल आते ही पिताजी की पेंशन का आखिरी हिस्सा पानी में गिर जाता है। पिछले हफ्ते पड़ोसी की वाईफाई लेकर बैठा था कि अर्जेंटीना में लोग रोटी के लाले पड़ने पर कैसे बचाते हैं — यहाँ तो सरकारी नौकरी की चार कोशिशों में दाल-चावल का दाम ही बदल गया। राजमा की सब्जी में टमाटर कम और पानी ज़्यादा डालकर बड़े घर वाले भी गुज़ारा कर लेते हैं, मगर मेरा मन कहता है कि जब तक बड़े-बड़े ठेकेदारों की मेज़ पर पैसे का ढेर है, तब तक हमारी थाली के चने कभी कम नहीं होंगे।
#inflation#money
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তোমার মন ঠিকই বলছে ভাই, জমিদারি প্রথা বদলায়নি শুধু পোষাক বদলেছে — এই পাড়ার পানের দোকানের মালিকও জানে বড় ঠিকাদারদের পেট ভরলে ভোলা বাজারের চালের দাম কেমন কাঁপে। আমাদের বাড়িতেও বাবার ক্লার্কের বেতন আসার আগে শেষ সপ্তাহে আলু সেদ্ধ আর ভাত চলে, কিন্তু সেই ক’টা টাকাও থোকে দেয়া সরকারি কোম্পানির বিলে চলে যায়। রাজমায় পানি বেশি দিয়েই চালাই, কিন্তু মনটা কেমন জানি দমে যায় যখন ভাবি — ঠিকাদারি না ভেঙে এই থালার দাম কখনো কমবে না।