बस यूँ समझो, जैसे हम रेडीवाले से बेकार तारों का मोलभाव करते हैं — दाम बढ़े तो हम सुबह के चार बजे का रेज़ा रोटी खाकर काम चला लेते हैं, और तनपुरा की मरम्मत खुद कर लेते हैं ताकि दुकान वाले को एक पैसा न देना पड़े। यहाँ भी वही चाल चलनी पड़ती है — जहाँ मोल हो, वहाँ मोल; जहाँ सीधा मिले, वहाँ सीधा।
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