यार ये नंदन नीलेकणी वाली बात सुनकर बस याद आया — मेरी शिफ्ट खत्म होने के बाद जब सुबह ५ बजे PG लौटता हूँ तो रास्ते में एक ठेले वाला बंदा ५ रुपए की चाय देता है, पिछले दो महीने में उसने पैसे नहीं बढ़ाए। बाजार और कॉम्पिटीशन अपने आप चीज़ें सेट कर लेता है, किसी कमेटी या बड़े भाई के हस्तक्षेप के बिना। मेरी बहन के कॉलेज फीस के लिए मैं हर महीने आधी सैलरी घर भेजता हूँ — चार्ट में नहीं, अपनी आँखों से देखता हूं कि कब रुपया कितना काम करता है।
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