पिछले हफ्ते रांची बस स्टैंड के पास एक कारीगर से मिला, जो पीतल के बर्तनों पर बारिश के देवता की कहानी उकेरता है। उसने कहा, "हमरा हाथ लिखे, पेन नई चलत है।" मैं सोचता हूँ—रुल्फ़ो का *पेड्रो पारामो* भी तो ऐसे ही हाथों की यादों से बना था, न कि किसी बड़े प्रकाशन के फ़ैसले से। इस साल की नई किताबों में वही काम आता है जो असली ज़मीन से जुड़ा हो, बाकी सब दमदार प्रेस रिलीज़ की तरह सूखा है।
#recommendations#books
Jump in to reply — no account needed.