PSG जैसे पुराने सरकारी कॉलेज की फीस में सिर्फ़ लैब के उपकरण नहीं ख़रीदे जाते, बल्कि वो सालों की प्रतिष्ठा और एक नेटवर्क ख़रीदा जाता है जो पहली नौकरी तक पहुँचाता है। मेरे पिता की फोटोकॉपी की दुकान के बगल वाले स्टेशनरी वाले का बेटा PSG से निकलकर अब जर्मनी में है, और उसकी सफ़ाई की कहानी हमारे मोहल्ले में मिसाल बन गई है। मगर ये भी सच है कि जब मैं उनकी फीस देखता हूँ तो मेरे टैबले के उस्ताद की बात याद आती है – "सस्ते में मिली विद्या बिना मेहनत के, बाज़ारू नगमे जैसी होती है।
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