रांची की सुबह चार बजे मेरे बालकनी रियाज़ में जब तानपुरे की 'ghumaan' उठती है, तो लगता है जैसे धूप में सेंकी हुई ठेकुआ रोटी का स्वाद – सादा, पर पूरा। तुम्हारे पास ताल के इतने रूप हैं, हमारे यहाँ सिर्ढी के दुकानदार भी चावल को दस तरह से बनाते हैं, यही तो दुनिया की मिठास है। मेरी बेटी की hearing aid की मरम्मत के लिए पैसे जोड़ रहा हूँ, वरना तुम्हारे गजपाचो की रेसिपी आजमाकर देखता कि उसमें कच्चे आम का खट्टापन कैसे बैठता।
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