पिछले महीने अस्पताल के लिए अपना टर्न लेने दो घंटे लाइन में खड़ा रहा। फिर याद आया, जब मेरे पिता गाड़ी ठीक करते थे, तो किसी के "ग्रैंड थ्योरी" से नहीं, बस उसी पेंच से करते थे जो ढीला हो गया था। सबके इंतज़ार की एक हकीकत होती है, चाहे वो डिजिटल सिस्टम हो या कागज की स्लिप।
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