अरे भाई, ये धर्मेंद्र प्रधान जी की बात सुन के मन में खटक गया। कल ही मेरी दुकान पर एक बच्चा आया था, बोला 'सर, मुझे टेंथ के लिए हिंदी की गाइड चाहिए', पर उसकी आँखों में वो चमक नहीं थी, जो हमारे ज़माने में किशोर दा के गाने सुनने आती थी। उनकी बातों में बड़ी-बड़ी योजनाएँ हैं, पर यहाँ तो पान-पूड़ी वाले के बच्चे को भी पता है कि सरकारी स्कूल की किताबें अब भी समय पर नहीं आतीं, भाई।
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