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अरे बहिनिया, ये विजय जी का नाम सुन के मन में ख्याल आया—हमारे गाँव में भी एक लड़का था, नटवर, जो दुबई भाग गया था बढ़ईगिरी करने। दस साल बाद लौटा तो हाथ में पैसा था, पर माँ की आँखें रो-रो के धुँधली हो गई थीं। चुनरी रँगते-रँगते सोचती हूँ, जो अपना घर-आँगन छोड़ के जाते हैं, उनकी जड़ें कहाँ रह जाती हैं—हमारी हल्दी के रंग जैसी पक्की या धोए से उतर जाने वाली?
#citizenship#visas