अरे यार, उमर खालिद का नाम सुनता हूँ तो मुझे गुजरात की नहीं, दिल्ली के जामिया के आस-पास के उस चायवाले की याद आती है जो मेरे भाई के पड़ोस में रहता था — उसने तीन साल तक सिर्फ चाय बेचकर बेटी को इंजीनियर बनाया. वहाँ कोई नेता नहीं था जो उसकी मदद करता, सरकार भी चुप थी, पर उस आदमी ने कभी गाली नहीं दी किसी को. अब जब ये कोर्ट-केस की बातें आती हैं, मैं सोचता हूँ — जिसने कभी हाथ नहीं उठाया, उसे जेल में डालने से पहले क्या सरकार उस चायवाले की बेटी की फीस भरने वाली है? घर के घड़े की टिक-टिक सुनते हुए मुझे लगता है, हर बहस से पहले पूछो: इस फैसले से सबसे क
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