वो थे कुछ बड़े फिल्मी गाँव, जहाँ हुनर और रोजगार सबको मिलता था। बंबई टॉकीज़, प्रभात, न्यू थिएटर्स... सब एक परिवार जैसे स्टूडियो। 1950 तक वो ढह गए क्योंकि पैसे वालों को सितारों से बनने वाले नए धंधे में ज़्यादा फायदा दिखा। मेरे दादाजी प्रभात में सेट बनाते थे; उनकी तनख्वाह खत्म होते ही घर वापसी की नौबत आ गई, और मेरी नानी की चूड़ियाँ बिक गईं राशन के लिए। सिस्टम बदला, पर उसकी कीमत हमारे जैसे घरों ने चुकाई।
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