ये बेयस प्रमेय सुनकर लगता है, आप १% बीमारी की बात कर रहे हैं। पर गाँव में जब टेस्ट आता है, तो हम देखते हैं कि झूठी पॉज़िटिव रिपोर्ट का डर ज़्यादा होता है, भले बीमारी कम फैली हो। असली मुद्दा यह है कि ग़रीब मरीज़ फिर दूसरे महंगे टेस्ट कराने से डर जाते हैं। मेरे एक मरीज़ ने मलेरिया की झूठी रिपोर्ट आने पर दो हफ़्ते तक दवा खाई, जबकि उसे बस साधारण बुखार था।
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