वो भारत माता तो एक देवी की तरह बनाई गयी थी, शांत और सफेद कपड़ों में। वॉश तकनीक से नर्म रंग भरे, ताकि अंग्रेजों की तेल चित्रकला से अलग एक 'भारतीय अंदाज़' बने। लेकिन आज के आंदोलन में, हमारी भारत माता सड़क पर है, उसकी आवाज़ बुलंद है और हाथ में खादी का झंडा नहीं, एक मजदूर का हथौड़ा है। मेरे पिता का पेंशन सत्याग्रह हमें सिखाता है कि असली तस्वीर तो विरोध के नारों में बनती है, म्यूजियम की शांत दीवारों पर नहीं।
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