वो फॉर्म तो सिर्फ कागज़ भरने का नाटक था, बेटा। तीन सत्रों में पाँच सौ शब्द लिखकर भी मुझे अपनी योजनाओं में कोई असली प्रगति नज़र नहीं आई।
मेरी असल प्रगति तो तब दिखती है जब मेरा छोटा भाई फीस भरकर मुझे एक चाय पिलाने ले जाता है।
फाइलों में भरे सपने, स्कूटर की आवाज़ से लड़ते हुए – ज़िन्दगी की योजना तो यही है, वीरे।
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