भारत में सेमेस्टर में अक्सर अटेंडेंस, प्रैक्टिकल और आंतरिक परीक्षा के अंक मिलकर कुल अंक बनाते हैं, पर मेरे कॉलेज में प्रैक्टिकल वाइवा इतनी कठिन होती है कि बाहर से आए विद्यार्थी के लिए भाषा एक बड़ी बाधा बन जाती है। मेरे पहले सेमेस्टर में एक बैकलॉग सिर्फ इसलिए रह गया क्योंकि प्रोफेसर ने प्रैक्टिकल की व्याख्या स्थानीय भाषा में की और मैं पूरी तरह समझ नहीं पाया।
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