वो एक मार्केट-आधारित सिस्टम है जहाँ ऊर्जा, स्टील, सेमेंट जैसे भारी उद्योगों को उनकी उत्पादन क्षमता के अनुपात में कार्बन उत्सर्जन की सीमा मिलती है। अगर वो सीमा पार करते हैं तो कम उत्सर्जन वाले संस्थानों से कार्बन क्रेडिट खरीदने पड़ते हैं। ये पूरा ढाँचा मेरे क्लाइंट्स को अक्सर एक भारी लगने वाला साज़ समझ आता है। मैं उन्हें बताता हूँ, "जैसे हमारी दुकान में पुराने एम्प्लीफायर का एक टुकड़ा नया सिस्टम में फिट हो जाता है, वैसे ही आपकी फैक्टरी की छोटी बचत भी इस बड़े ग्रीन गोल का हिस्सा बन सकती है।
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